Roots Breathe: जड़ें कैसे साँस लेती हैं? मिट्टी में ऑक्सीजन की छुपी हुई भूमिका
Roots Breathe: फसल की सेहत और पैदावार के लिए मिट्टी की हवा पानी जितनी ही क्यों ज़रूरी है? किसान आम […]
Roots Breathe: फसल की सेहत और पैदावार के लिए मिट्टी की हवा पानी जितनी ही क्यों ज़रूरी है? किसान आम […]
भारतीय गांवों में महिला किसान की मेहनत से मिट्टी की सेहत, फ़सल विविधता और परिवार का पोषण सुरक्षित रहता है, यही टिकाऊ खेती की असली ताक़त है।
Kisan of India Samman 2025 के मंच पर एक बड़ा सवाल उठा- Climate change के इस दौर में पारंपरिक फसलें टिक नहीं पा रहीं, तो किसान क्या करे? इसका जवाब दिया Indian Agricultural Research Institute (IARI) के Principal Scientist Dr. Naved Sabir ने ।
Indian Council of Medical Research (ICMR) के एक ताजा और डीप स्टडी कहती है कि कीटनाशकों (insecticides) के लगातार संपर्क में आने से किसानों में डिप्रेशन, याददाश्त की कमजोरी और दिमाग से जुड़ी कई गंभीर बीमारियों का खतरा (Farmers are at risk of depression, memory loss, and several serious brain-related diseases) तेज़ी से बढ़ रहा है।
इस आर्टिकल में जानिए कैसे रंगीन क्रांतियों (Colorful Revolutions) ने देश की तकदीर बदल दी। ये क्रांतियां केवल प्रोडक्शन बढ़ाने तक सीमित नहीं थीं, बल्कि इन्होंने राष्ट्र की सामाजिक-आर्थिक बुनियाद को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया।
‘पराली जलाना’ या ‘Stubble Burning’। ये सिर्फ एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि एक गहरा कृषि, आर्थिक और सामाजिक संकट है जिसकी जड़ें हमारी खेती की व्यवस्था में गहरे तक धंसी हुई हैं।
उत्तराखंड में बादल फटने से (Climate Crisis) तबाही मच जाती है, तो केरल और असम में बाढ़ ने लाखों लोगों को बेघर कर दिया है। यह कोई सामान्य मौसमी उथल-पुथल नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का स्पष्ट और डरावना चेहरा है, जो सीधे हमारे किसानों और हमारे फसलों पर हमला कर रहा है।
भारत में रेशम (Silk) का इतिहास हज़ारों साल पुराना है। पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि रेशम का जन्म चीन में हुआ, लेकिन भारत ने इसे अपनाकर एक नई पहचान दी। कुछ विद्वान मानते हैं कि ऋग्वेद में ‘तृप’ नामक वस्त्र का जिक्र रेशमी वस्त्र ही था।
1960 के दशक में शुरू हुई हरित क्रांति (Green Revolution) ने न केवल भारत को खाद्यान्न (Food grain production) में आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि यही वो दौर था जहां से भारत में कृषि मशीनीकरण (Agricultural Mechanization) की वास्तविक शुरुआत हुई। उच्च उपज वाली किस्मों (HYV) के बीजों ने जहां उत्पादन बढ़ाया, वहीं उनकी कटाई, गहाई और सिंचाई के लिए मशीनों की ज़रूरत महसूस हुई।
हरित ऊर्जा (Green Energy) के क्षेत्र में भी एक ग्लोबल लीडर (Global Leader) की भूमिका निभा रहा है। जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण (Climate change and pollution) की चुनौतियों से निपटने के लिए भारत ने स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy) को अपनी प्राथमिकता बनाया है और इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
बायोफर्टिलाइजर और बायोस्टिमुलेंट (Bio-Fertilizers and Biostimulants) के बीच कंफ्यूज हैं? अगर हां, तो ये आर्टिकल आपके लिए है। हम आपको आसान भाषा में बताएंगे कि ये दोनों चीजें कैसे काम करती हैं
Weather Update के अनुसार अगले कुछ दिन किसानों के लिए बेहद अहम हैं जानिए बारिश और हीटवेव से जुड़ी हर जरूरी जानकारी
आजकल बाजार में नकली बीजों (How To Identify Fake Seeds) की बाढ़ आ गई है। जो देखने में असली लगते हैं, लेकिन बोने के बाद पछतावा छोड़ जाते हैं।
भारी बारिश से फ़सलों का बचाव (Protecting Crops from Heavy Rains) करने के लिए जानिए आसान और असरदार उपाय जो आपकी फ़सल को नुक़सान से बचा सकते हैं।
प्रकृति ने हमें कुछ ऐसी जड़ी-बूटियां और मसाले (Summer Cooling Herbs and Spices) दिए हैं, जो शरीर को ठंडक पहुंचाने के साथ-साथ स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाते हैं।
कुटकी की खेती (Cultivation of Kutki) एक लाभदायक औषधीय फ़सल है जिसे पहाड़ी क्षेत्रों में आसानी से उगाया जा सकता है। जानिए इसकी पूरी जानकारी, लागत, मुनाफ़ा और खेती की विधि।
बड़ी इलायची की खेती (Large cardamom cultivation) कम लागत में अधिक मुनाफ़ा देने वाली औषधीय फ़सल है जो पहाड़ी और आर्द्र जलवायु वाले क्षेत्रों के किसानों के लिए एक बेहतरीन विकल्प बन चुकी है।
सर्पगंधा की खेती (Sarpagandha Ki Kheti) कम मेहनत में ज़्यादा मुनाफ़ा देने वाली औषधीय फ़सल है। जानें इसकी पूरी जानकारी, तरीका और कमाई का अंदाज़ा।
आज केले (Banana) की खेती 150 से अधिक देशों में होती है, जहां हर साल लगभग 105 मिलियन टन उत्पादन होता है। स्थानीय उपभोग के लिए उगाए जाने वाले केले आमतौर पर पारंपरिक तरीकों से उगाए जाते हैं। वहीं, कैवेंडिश जैसी मीठी किस्में वैश्विक दक्षिण के कई देशों के लिए आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, जिनका वार्षिक उत्पादन लगभग 43 मिलियन टन है।
बफ़र ज़ोन (Importance Of Buffer Zone) वे सुरक्षित क्षेत्र होते हैं जो दो अलग-अलग भूमि उपयोगों को अलग करते हैं, ताकि संघर्षों को कम किया जा सके और पर्यावरणीय नुकसान को रोका जा सके। कृषि में, ये ज़ोन खेतों और आसपास के प्राकृतिक संसाधनों (जैसे नदियों, जंगलों या आवासीय क्षेत्रों) के बीच एक बफ़र का काम करते हैं।