आज के वक्त में मछली पालन पूरी दुनिया में एक बड़ा व्यवसाय का रूप ले चुका है और भारत दुनिया में मछली उत्पादन के क्षेत्र में दूसरा स्थान रखता है। मछली की बढ़ती मांग के चलते अपने देश में मछली उत्पादन आठ फ़ीसदी की दर से सबसे तेजी से ग्रोथ करने वाला कृषि सह-व्यवसाय बन गया है। आज मछली पालन के लिए बड़ी मात्रा में मछली बीज यानी कि स्पॉन की ज़रूरत पड़ रही है। इस अवसर का लाभ उठाकर बेरोज़गार ग्रामीण युवा और किसान मछली बीज उत्पादन का प्रशिक्षण लेकर, इस व्यवसाय को अपने क्षेत्र में ही शुरू कर आमदनी का बेहतरीन ज़रिया बना सकते हैं। इस पर विस्तार से जानकारी के लिए किसान ऑफ़ इंडिया ने बिन्ध्याचल मंडल मिर्ज़ापुर उत्तर प्रदेश के मत्सय विभाग के उपनिदेशक डॉ. मुकेश सारंग से ख़ास बातचीत की।
ग्रामीण युवको के लिए रोज़गार का सुनहरा अवसर फिश हैचरी
आज के वक्त में ग्रामीण इलाकों में मछली बीज उत्पादन का कार्य काफ़ी लाभकारी है। ये ग्रामीण युवकों के लिए रोज़गार का सुनहरा अवसर है। डॉ. मुकेश सारंग ने बताया कि मछलियां बारिश में नदी, तालाबों इत्यादि में प्रजनन करती हैं। इस दौरान इन जगहों पर मछलियों के लाखों अंडे निषेचित होकर, मछलियों के बच्चे बाहर निकल आते हैं। इन्हें मत्स्य बीज कहते है। इन बीजों को स्पॉन, फ्राई और फिंगरलिंग्स कहा जाता है। तालाबों और जलाशयों में केवल एक प्रजाति की मछली के बीज नहीं होते, बल्कि कई प्रजातियों के मछलियों के बीज होते हैं। इनका संग्रहण करना खतरों से भरा होता है, क्योंकि इनके साथ परभक्षी मछलियों के बीज की संभावना ज़्यादा रहती है। इसलिए पालने वाली मछलियों के शुद्ध बीज प्राप्त करने का एक तरीका फिश हैचरी है। हैचरी में ढाई से तीन करोड़ मछली बीज उत्पादन किया जा सकता है। इस पर सरकार की तरफ़ से अलग 40 से 60 फ़ीसदी सब्सिडी का प्रावधान भी है।

मछली बीज उत्पादन तकनीक
मत्स्य विभाग के उपनिदेशक आगे बताते हैं कि आज के वक्त में मछली पालक, मत्स्य हैचरी के मछली बीजों पर अधिक भरोसा करते हैं। उन्होंने बताया कि मत्स्य हैचरी के लिए स्थाई टैंक बनाये जाते हैं। इन हैचरी में वयस्क नर और मादा मछलियों को उत्प्रेरित कर प्रजनन करवाया जाता है। इसके लिए स्थाई टैंक में कृत्रिम रुप से बारिश कराते हैं। मछलियों को निश्चित मात्रा में हार्मोन्स के इंजेक्शन देकर प्रजनन हेतु प्रेरित किया जाता है। ये हार्मोन बाज़ार में हर जगह उपलब्ध हो जाते हैं। इससे इन मछलियों में अंडे बनने व फर्टिलाइजेशन प्रक्रिया जल्दी से हो जाती है। ये प्रकिया प्रजनन कुंड या तालाब में रखे मच्छरदानी के कपड़े से निर्मित आयाताकार बक्सा, जिसे हापा कहते हैं, उसमें भी कराई जाती है।
हैचरी में कैसे करें मछली बीजों का प्रबंधन
डॉ. मुकेश सांरग बताते हैं कि बड़ी आकार की मछलियों की प्रजाति की बात की जाए तो इनमें भारतीय मेजर क्रॉप रोहू मादा, जिसका वजन एक किलों होता है, प्रजनन करने के बाद उसकी एख लाख अंडे देने की क्षमता होती है।
बात करें हैचरी की तो इसमें गोलाकार के सीमेंट और कंक्रीट के सात मीटर व्यास परिधि के टैंक बनाए जाते हैं। इससे जोड़कर दो छोटे व्यास से दो टैंक बनाए जाते हैं। छोटे टैंक के अंदर पाइप गोल आकार होने के साथ उसमें 12 डक माउथ आकर खुले होते हैं, जो पानी को लगातार घुमाते रहते हैं, जिससे कि अंडे इसी में रन करते रहे और टैंक में पानी चलता रहता है। बच्चे को अंडे से बाहर आने में 36 घंटे लगते हैं। इन बच्चो को 72 घंटे तक आहार की ज़रुरत नहीं पड़ती है। इसी में एक महीन जाली लगी रहती है, जिससे अंडे से बच्चे बने तो इसमें तैयार हो सके।

लाखों की कमाई का बेहतर ज़रिया फिश हैचरी
डॉ. सांरग ने जानकारी दी कि अंडे से मछली के पांच मिलीमीटर साइज़ बच्चे निकलते है। दरअसल, इनको स्पॉन यानी जीरा कहते हैं। इसका भरण पोषण नर्सरी में करते है। तीन से चार हफ़्ते नर्सरी में रहने के बाद इनका साइज़ 20 से 25 मिलीमीटर का हो जाता है, जिनको फ्राई यानी पौना भी कहते हैं। इसके बाद यह तीन माह तक बड़े पॉन्ड में रखे जाते हैं, जहां 75 से 100 एमएम साइज के तैयार होते हैं। तब इनको तालाब में डाल दिया जाता है।। इनको फिंगरलिंग यानी अंगुलिकाए कहा जाता है। इस तरह की हैचरियों से साल में लगभग तीन करोड़ मछली के बीज यानी फ्राई तैयार किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि अच्छी प्रजाति के जैसे रेहू, कतला, मृगल, ग्रास कार्प, सिल्वर कार्प एवं कॉमन कार्प मछलियों का बीज उत्पादन होता है। इसके पौना बीज यानी फ्राई आकार की मछली बीज लगभग 110 रुपये प्रति हजार और जीरा 750 रूपये प्रति लाख की दर से बाज़ार में बेचे जाते हैं। इस प्रकार कुल 36 लाख रुपये का मछली बीज हैचरी में हर साल तैयार होता है। मछली बीज उत्पादन पर लगने वाले खर्च की बात की जाए तो 50 से 60 फ़ीसदी इसके उत्पादन पर खर्च हो जाता है, जो बचता वह शुद्ध मुनाफ़ा हो जाता है।उन्होंने बताया कि फिश हैचरी तैयार करने में 25 लाख रुपये के आसपास खर्च आता है।

मछली बीज उत्पादन की ट्रेनिंग ज़रूरी
डॉ. सांरग ने कहा कि मछली बीज उत्पादन करना इतना सरल भी नहीं कि इसे हर कोई कर ले। इसमें जोखिम भी हो सकता है। इसलिए जो व्यक्ति मछली बीज उत्पादन का कार्य करना चाहता है, उस व्यक्ति को पूरी जानकारी होना ज़रूरी है। इसके लिए वह राजकीय मत्स्य विभाग,कृषि विश्वविद्यालयों, मात्सिकीय शोध संस्थानों में जाकर जानकारी प्राप्त कर सकता है।
डॉ मुकेश सांरग ने आगे बताया कि मछलियों के प्रजनन का समय जून से सिंतबर तक रहता है। जुलाई से अगस्त प्रजनन का सबसे अच्छा समय होता है। इन महीनों में मछली बीजों की ज़बरदस्त मांग रहती है। उन्होंने कहा कि आपूर्ति कम होने की स्थिति में इन बीजों के दाम और भी अधिक बढ़ जाते हैं। इस अवसर का लाभ उठाकर अपने इलाके मे बेरोज़गार ग्रामीण युवा और किसान मछली बीजोत्पादन का प्रशिक्षण लेकर इस व्यवसाय को अपने क्षेत्र में ही शुरू करें तो आमदनी का बेहतरीन ज़रिया हो सकता है। दूसरी तरफ़ अच्छी प्रजाति की मछलियों के बीज गाँव स्तर पर उपलब्ध होंगे तो मछली उत्पादन भी बेहतर होगा। इसके लिए ज़रूरी है कि किसान मछली पालन की नई तकनीकों को अपनाएं।
ये भी पढ़ें: मछली के साथ बत्तख पालन यानी दोगुना लाभ, एक्सपर्ट एनएस रहमानी से जानिए कैसे शुरू करें Fish Cum Duck Farming
सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

ये भी पढ़ें:
- केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय का बड़ा ऐलान: रेशम उत्पादक किसानों की बढ़ेगी आमदनी,’सर्वश्रेष्ठ रेशम किसान पुरस्कार’ की शुरुआत की घोषणासरकार की रणनीति सीधी और वैज्ञानिक है। शहतूत के पत्तों की पैदावार बढ़ाकर और रेशम के कीड़ों के पालन-पोषण के राउंड को बढ़ाकर किसानों की आमदनी 10 से 12 लाख रुपये तक ले जाने का टारगेट है।
- पराली जलाने पर केंद्र सख़्त: ज़मीन के रिकॉर्ड में 15 महीने तक दर्ज रहेगा नाम, दोबारा जलाने पर और कड़ी कार्रवाई!ये नियम दिल्ली-एनसीआर और आसपास के उन इलाकों में लागू होगा जहां पराली जलाने की घटनाओं का असर दिल्ली की हवा पर पड़ता है।
- Samriddh Vidisha Model: तैयार हुआ ग्रामीण गरीबी को जड़ से ख़त्म करने के लिए नया रोडमैपSamriddh Vidisha Model की सबसे बड़ी ख़ूबी है कि आमदनी के एक नहीं, कई साधन है। किसानों को आधुनिक खेती के साथ दूध, बकरी, मुर्गी और मधुमक्खी पालन से जोड़ा जाएगा, ताकि एक सोर्स रुकने होने पर परिवार न बिखरे।
- दक्षिणी क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन 2026 में राज्यों को समय पर लक्ष्य पूरा करने के निर्देशदक्षिणी क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन 2026 में राज्यों से Farmer ID, AgriStack और कृषि लक्ष्यों को तय समय में पूरा करने को कहा गया।
- Mahila Shetkari Portal: महाराष्ट्र सरकार का ऐतिहासिक कदम,अब खेत में काम करने वाली हर महिला बनेगी ‘किसान’अधिनियम के अनुसार, महिला को किसान मानने का आधार सिर्फ ज़मीन का मालिकाना हक नहीं, बल्कि खेती में उसकी ‘वास्तविक भागीदारी’ होगी।
- Soil Carbon Payments से किसानों को अतिरिक्त आय की नई पहलSoil Carbon Payments के ज़रिए पंजाब और हरियाणा के 2500 से ज़्यादा किसानों को 2.9 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान मिलेगा।
- Reimagining Indian Agriculture रिपोर्ट में ख़ुलासा : देश के कुल भू-भाग का लगभग 33 फीसदी ज़मीन बंजर!देश के कुल भू-भाग का लगभग 33 फीसदी ज़मीन ख़राब हो रही है। रिपोर्ट में ICAR-Indian Institute of Soil Science के आंकड़ों का हवाला दिया गया है।
- त्योहारी सीजन में राहत की उम्मीद: सरकार घटा सकती है खाद्य तेल पर आयात शुल्कभारत अपनी खाद्य तेल की ज़रूरत का करीब दो-तिहाई हिस्सा आयात से पूरा करता है। ये आयात मुख्य रूप से मलेशिया, इंडोनेशिया, अर्जेंटीना, रूस और यूक्रेन से होता है।
- बिहार में बाढ़ से फ़सल नुक़सान का जायज़ा लेने पहुंचे शिवराज सिंह चौहानशिवराज सिंह चौहान ने बिहार में बाढ़ प्रभावित इलाकों का जायज़ा लिया और किसानों को केंद्र से हर संभव मदद का भरोसा दिया।
- सिवनी का जम्बो सीताफल: जीआई टैग के साथ बदलेगी किसानों की तकदीर,इंटरनेशनल मार्केट से जोड़ने की तैयारी शुरूसिवनी का जम्बो सीताफल (Seoni’s Jumbo Custard Apple) औसतन 200 से 650 ग्राम का होता है, लेकिन भूतबंधानी क्षेत्र में कई फल 800 ग्राम से 1 किलोग्राम तक के मिलते हैं।
- World Circular Economy Forum 2026 में भारत की सर्कुलर इकॉनमी पर वैश्विक चर्चाWorld Circular Economy Forum 2026 में 62 देशों के 3600 से अधिक stakeholders ने Circular Economy पर चर्चा की।
- किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना: 32 साल इंतज़ार के बाद ऐतिहासिक समझौता,जानिए किस राज्य को मिलेगा सबसे बड़ा लाभकिशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना (Kishau Multipurpose Project) की नींव 1994 के ऊपरी यमुना जल समझौते में रखी गई थी, लेकिन आर्थिक बोझ और राज्यों के हितों के टकराव ने इसे आठ साल तक ठप कर दिया।
- खेती के साथ मधुमक्खी पालन: पाएं 1.28 लाख का अनुदान,1.92 लाख रुपये की लागत में शुरू करें अपना ख़ुद का बिज़नेसमधुमक्खी पालन की सबसे बड़ी खूबी ये है कि इसके लिए आपको बड़े खेत या अलग ज़मीन की ज़रूरत नहीं है। आप अपने घर के आसपास, बगीचे में, पेड़-पौधों वाली जगह पर आसानी से यह यूनिट लगा सकते हैं।
- Google और Mitti Labs का बड़ा करार: धान के खेतों से मीथेन गैस की कटौती और पानी की बचतमिट्टी लैब्स अपनी ‘Geo-AI’ Technology का इस्तेमाल कर रही है, जिसे नासा के सहयोग से विकसित किया गया है।
- CAZRI Moth Bean की क़िस्मों ने सूखे में दिखाई शानदार सहनशीलता, 35 दिन तक बारिश न होने पर भी बनी रही फ़सलCAZRI Moth Bean की क़िस्मों ने 35 दिन के सूखे में भी बेहतर प्रदर्शन कर जलवायु अनुकूल खेती की उम्मीद बढ़ाई।
- ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज: ग्लोबल साउथ की फ़सल का असली मोल वापस पानाब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज से ग्लोबल साउथ के किसानों को फ़सल की क़ीमत तय करने में कैसे अधिक अधिकार और वैश्विक कृषि बाज़ार में नई भूमिका मिल सकती है, जानें।
- BRICS Summit 2026 : कृषि में AI, जियोस्पेशियल टेक्नोलॉजी और डिजिटल सेवाओं से किसानों, कारोबारियों को होगा लाभBRICS देशों के लिए Early Warning Data Integration Guidelines तैयार की गई हैं। इसका मकसद बाढ़, चक्रवात या भूकंप जैसी आपदाओं से पहले देशों के बीच डेटा साझा करना है
- आंध्र प्रदेश सरकार का पोल्ट्री फार्मस के लिए 657 करोड़ का तोहफ़ा, ब्याज से लेकर बिजली तक सब सस्ताशहरी क्षेत्रों में पोल्ट्री शेड बनाने पर लगने वाले डेवलपमेंट और बेटरमेंट चार्ज से छूट दी गई है। ग्राम पंचायतों के बराबर कम शुल्क पर मंज़ूरी मिलेगी।
- शिवराज सिंह चौहान ने छत्तीसगढ़ को 3.65 लाख नए PM आवासों की दी सौगात, 2 लाख परिवारों का हुआ गृह प्रवेशशिवराज सिंह चौहान ने छत्तीसगढ़ को 3.65 लाख नए PM आवास, सक्ती में KVK और बस्तर में आवास सर्वे की समयसीमा बढ़ाने की सौगात दी।
- क्लाइमेट सर्वाइवल किट: हमारे भविष्य को सुरक्षित करने वाला ‘ओपन-सोर्स सीड बैंक’क्लाइमेट सर्वाइवल किट के जरिए ब्रिक्स का जीनोम नेटवर्क ग्लोबल वार्मिंग के बीच जलवायु-अनुकूल खेती और बीजों का भविष्य तैयार कर रहा है।





















