बकरी का दूध बहुत पौष्टिक माना जाता है। कुपोषित बच्चों को बकरी का दूध दिया जाता है और इसका इस्तेमाल कई दवाओं के उत्पादन में भी होता है। बकरी का दूध कैल्शियम का भी अच्छा स्रोत है। मगर बकरी के दूध के बाज़ार को और बड़े स्तर पर विकसित करने की ज़रूरत है ताकि ज़्यादा लोगों तक ये पहुंच सके और बकरी पालकों को अधिक मुनाफ़ा हो। दूध के अलावा, बकरी के मांस की भी काफ़ी मांग है। इतना ही नहीं, बकरी के बाल को भेड़ के मोटे रेशे वाली ऊन के साथ मिलाकर कंबल, कलीजा, बोरा जैसी कई चीज़ें भी बनाई जाती हैं। यानी बकरी पालन को लघु उद्योग के रूप में अगर विकसित किया जाए तो इससे ग्रामीण इलाके में कई लोगों को रोज़गार मिल सकता है।
बकरी की नस्ल
अगर आप बकरी पालन का व्यवसाय शुरू करने जा रहे हैं, तो सबसे पहले आपको उनकी नस्ल के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। ICAR के मुताबिक, अगर आप दूध और मांस दोनों के उद्देश्य से बकरी पालन करना चाहते हैं तो जमुनापारी, बारबरी, बीटल, सुरती, जखराना नस्ल की बकरियां खरीदें। अगर आप सिर्फ़ मांस के लिए बकरी पालन करना चाहते हैं, तो ब्लैक बंगाल, गंजम, उस्मानाबादी, संगमनेरी और सिरोही नस्ल की बकरियां अच्छी मानी जाती हैं। अगर आप रेशा उत्पादन के लिए बकरीपालन कर रहे हैं, तो मारवाड़ी, गद्दी, चेंगु, चांगथांगी नस्ल खरीदें।

बकरी की विभिन्न नस्ल की ख़ासियत
जमुनापारी- उत्तर प्रदेश के आगरा और इटावा इलाके में मिलने वाली इस बकरी की नस्ल को दूध और मांस दोनों के लिए पाला जाता है। नर का वज़न 50-60 किलोग्राम और मादा का वज़न 40-50 किलोग्राम तक होता है। ये आमतौर पर सफ़ेद रंग की होती है और शरीर पर काले भूरे रंग के धब्बे होते हैं।
ब्लैक बंगाल- पश्चिम बंगाल और असम में मिलने वाली इस बकरी का साइज़ छोटा होता है। रंग काला/भूरा, सींग ऊपर की ओर उठे हुए औ छाती चौड़ी होती है। नर का वज़न 30 किलोग्राम तक और मादा का वज़न 20 किलोग्राम तक होता है।
बारबरी- ये नस्ल मुख्य रूप से राजस्थान और उत्तर प्रदेश में मिलती है। इसका वज़न 40 किलोग्राम तक होता है। इसका आकार छोटा, छोटे कान और छोटे सींग होते हैं। इसका रंग सफ़ेद और भूरा होता है।
बीटल- पंजाब और हरियाणा की ये नस्ल बड़े आकार की होती है। इनका रंग भूरा, कान लंबे और सींग पीछे की ओर मुड़े हुए होते हैं। नर का वज़न 50-60 और मादा का वज़न 40-50 किलोग्राम तक होता है।
सिरोही- राजस्थान का सिरोही और अजमेर ज़िला इसका उत्पत्ति स्थान है। नर का वज़न 40-50 किलोग्राम और मादा का वज़न 30-40 किलोग्राम तक होता है।

बकरी पालन में ध्यान रखने वाली बातें:
- व्यवसाय शुरू करने से पहले बकरी की नस्ल और उससे मिलने वाले उत्पदान की पूरी जानकारी जुटा लें।
- राजस्थान में अगर कोई बकरी पालन करना चाहता है, तो उसके लिए मारवाड़ी नस्ल की बकरी सबसे अच्छी होती है। क्योंकि इससे चमड़ा, दूध और बाल प्राप्त होता है।
- बकरियों को संतुलित आहार देना चाहिए। इससे वज़न और दूध उत्पादन बढ़ता है।
- बकरियों को साफ़ पानी पिलाना चाहिए, ताकि वो बीमारियों से बचे रहें।
- मादा बकरियों को उन्नत नस्ल के बकरे से ही गाभिन करवाना चाहिए।
- शुरुआत में ही ज़्यादा बकरियां नहीं खरीदनी चाहिए। दस-दस के स्लॉट में बकरियां रखें। एक साथ ज़्यादा बकरियां रखने पर देखभाल सही तरीके से नहीं हो पाती।
- बीमार बकरियों को अलग कर देना चाहिए। साथ ही बकरियों के रोग की पहचान करके सही समय पर उपचार करना ज़रूरी है।
- बीमारी से बचाने के लिए बकरियों का टीकाकरण भी ज़रूरी है।

बकरियों को दें पौष्टिक चारा
- सन्तुलित आहार, साफ़ और पाचक हो। चारे को एकदम नहीं बदलें।
- आहार में भूसा, हरा चारा व दाना शामिल हो। अच्छे से तैयार चारा व दाना दिन में दो बार दें ( कुतर, भिगोना, उबालना, दलकर)
- गर्भित बकरियों व दूध देने वाली बकरियों को अलग से राशन दें।
- बकरियों को 2-2.5 किलोग्राम शुष्क पदार्थ प्रति किलोग्राम शरीर भार पर दें।
- चारे में 1/3 भाग हरा चारा व 2/3 भाग सूखा चारा दें।
- बकरियों को उनके मदकाल के एक माह पूर्व से ही पूरक खिलाई शुरू कर दें, ताकि शारीरिक भार बढ़ जाये।
बकरियों में टीकाकरण
| संभावित महीना | रोग | प्राथमिक टीकाकरण | नियमित टीकाकरण |
| जनवरी | कन्टेजियस कैपराइन प्लूरो न्यूमोनिया (सीसीपीपी) | 3 महीने की उम्र में | सालाना |
| फरवरी | फड़किया | 4 महीने की उम्र में | सालाना |
| फरवरी | पीपीआर | 3 महीने की उम्र में | प्रत्येक तीन वर्ष में एक बार |
| जुलाई | गलाघोंटू | 6 महीने की उम्र में | सालाना |
| मार्च से अक्टूबर | मुंहपका-खुरपका | 4-5 महीने एवं उसके बाद में | साल में दो बार (मार्च और अक्टूबर) |
| दिसंबर | बकरी चेचक (पॉक्स) | 3 महीने की उम्र में | सालाना |
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