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झारखंड के सरायकेला-खरसावां ज़िले की रीडिंग पंचायत अब बदलाव की एक नई मिसाल बन गई है। कभी यह गांव अवैध अफ़ीम की खेती के लिए जाना जाता था, जहां कई किसान इसी रास्ते से अपनी आमदनी करते थे। लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। आज गांव के किसान धान और दूसरी पारंपरिक खेती की ओर लौट आए हैं और खेतों में फिर से हरियाली दिखाई देने लगी है।
इस बदलाव के पीछे प्रशासन की सख्ती, सरकार द्वारा चलाए गए जागरूकता अभियान और सबसे अहम, गांव के लोगों की सोच में आया बड़ा परिवर्तन है। अब लोग समझ चुके हैं कि मेहनत की कमाई ही टिकाऊ और सम्मानजनक होती है। रीडिंग पंचायत की यह सकारात्मक दिशा अब आसपास के गांवों के लिए भी एक प्रेरणा बन गई है।
अफ़ीम की खेती से बाहर निकलते किसान
कभी रीडिंग पंचायत के कई गांव अफ़ीम की खेती के लिए बदनाम थे, जहां किसान इस अवैध और नशे से जुड़ी खेती में शामिल होकर अपनी ज़िंदगी और समाज दोनों से दूर होते जा रहे थे। अफ़ीम की खेती ने न केवल गांव के माहौल को बिगाड़ा, बल्कि नई पीढ़ी के लिए भी एक गलत रास्ता खोल दिया था। इस स्थिति को देखते हुए सरकार और प्रशासन ने मिलकर लगातार जागरूकता अभियान चलाए।
अधिकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव जाकर लोगों को समझाया कि अफ़ीम जैसी नशे की खेती समाज, स्वास्थ्य और भविष्य सभी के लिए नुक़सानदायक है। शुरू में बदलाव आसान नहीं था, लेकिन समय के साथ किसानों की सोच में परिवर्तन आया। उन्होंने यह समझा कि अवैध कमाई से बेहतर है मेहनत की कमाई। इसके बाद उन्होंने अफ़ीम की खेती छोड़कर धान, दाल और दूसरी पारंपरिक खेती की ओर रुख किया, जो न सिर्फ़ कानूनी हैं, बल्कि सुरक्षित और टिकाऊ भी हैं।
जागरूकता अभियान का असर
पिछले कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकार ने नक्सल प्रभावित इलाकों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कई योजनाएं चलाईं। इसी कड़ी में रीडिंग पंचायत में भी अधिकारियों ने गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक किया। किसानों को बताया गया कि अफ़ीम की खेती न केवल अवैध है बल्कि यह आर्थिक और सामाजिक रूप से भी नुक़सानदेह है। पुलिस और प्रशासन ने जब यह मुहिम शुरू की, तो ग्रामीणों ने भी सहयोग किया। किसानों को यह भरोसा दिलाया गया कि यदि वे पारंपरिक खेती करेंगे तो उन्हें सरकारी योजनाओं और तकनीकी मदद से समर्थन मिलेगा।
100 एकड़ में नष्ट की गई अफ़ीम की खेती
पिछले साल प्रशासन ने रीडिंग पंचायत में बड़ी कार्रवाई की थी। लगभग 100 एकड़ जमीन पर फैली अफ़ीम की खेती को नष्ट किया गया। पुलिस अधीक्षक मुकेश कुमार लुणायत और स्थानीय अधिकारियों ने किसानों से अपील की कि वे अवैध खेती छोड़कर समाज की मुख्यधारा में आएं। इस सख्ती के साथ-साथ प्रशासन का समझाने का तरीका भी काम आया और किसानों ने आगे से केवल पारंपरिक खेती करने का संकल्प लिया।
महिलाओं ने निभाई अहम भूमिका
इस सकारात्मक बदलाव में गांव की महिलाओं की भूमिका भी अहम रही। उन्होंने परिवारों को समझाया कि अफ़ीम की खेती से केवल अपराध और गरीबी बढ़ती है, जबकि पारंपरिक खेती से घर की रसोई भी भरती है और समाज का विकास भी होता है। गांव की मुखिया नागेश्वरी हेंब्रम ने बताया कि आज गांव में खुशहाली लौट रही है, लोग आत्मनिर्भर हो रहे हैं और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान दिया जा रहा है।
आर्थिक और सामाजिक सुधार
रीडिंग पंचायत के इस बदलाव का असर सिर्फ़ खेती पर ही नहीं बल्कि पूरे गांव की सोच और जीवनशैली पर पड़ा है। किसान अब न केवल धान बल्कि दाल और अन्य स्थानीय फ़सलें भी उगा रहे हैं। इससे उनकी आय बढ़ रही है और गांव का आर्थिक ढांचा मज़बूत हो रहा है। अफ़ीम की खेती छोड़कर जब किसानों ने पारंपरिक खेती अपनाई, तो उनका आत्मविश्वास भी लौटा। आज वे सरकार की योजनाओं से जुड़कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं।
सरायकेला-खरसावां ज़िले की रीडिंग पंचायत बनी मिसाल
सरायकेला-खरसावां ज़िले की रीडिंग पंचायत की यह कहानी केवल एक उदाहरण है। झारखंड के कई और गांव हैं जहां सरकार और प्रशासन की पहल से धीरे-धीरे बदलाव हो रहा है। जिस तरह रीडिंग पंचायत के ग्रामीणों ने अफ़ीम जैसी अवैध खेती छोड़कर पारंपरिक खेती को अपनाया, यह पूरे राज्य और देश के लिए प्रेरणा है।
निष्कर्ष
रीडिंग पंचायत ने दिखा दिया है कि सही दिशा, जागरूकता और सहयोग से कोई भी बदलाव असंभव नहीं है। आज यहां के किसान नशे की खेती से बाहर निकलकर समाज की मुख्यधारा में लौट आए हैं। अब गांव का भविष्य धान, दाल और अन्य फ़सलों की खुशबू से महकेगा, न कि अफ़ीम के नशे से।
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