UPSC की तैयारी छोड़ फलों की खेती से सुधांशु कुमार ने की करोड़ों में कमाई

फलों की खेती से समस्तीपुर के सुधांशु कुमार सालाना 3 करोड़ कमा रहे हैं और आधुनिक खेती से ग्रामीणों को रोज़गार भी दे रहे हैं।

फलों की खेती Fruit Farming

बिहार के समस्तीपुर जिले के नयानगर गांव के रहने वाले सुधांशु कुमार की कहानी यह साबित करती है कि अगर इरादे मज़बूत हों और मेहनत सच्ची हो, तो खेती भी करोड़ों की कमाई का ज़रिया बन सकती है। सुधांशु कभी सिविल सेवा की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने खूब मेहनत की, लेकिन जब सफलता नहीं मिली, तो उन्होंने हार नहीं मानी। बल्कि उन्होंने अपनी सोच को नया मोड़ दिया और खेती को ही अपना करियर बनाने का फैसला किया।

शुरुआत में रास्ता आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे फलों की खेती (Fruit Farming) में हाथ आज़माया और खुद को इस क्षेत्र में पूरी तरह झोंक दिया। आज सुधांशु फलों की खेती (Fruit Farming) से हर साल करीब 3 करोड़ रुपये कमा रहे हैं। साथ ही, उन्होंने अपने फार्म पर कई लोगों को काम देकर उन्हें रोज़गार भी दिया है। उनकी ये कहानी न सिर्फ़ प्रेरणादायक है, बल्कि यह भी दिखाती है कि अगर सही सोच और मेहनत हो, तो खेती भी युवाओं के लिए एक सफल करियर बन सकती है।

पढ़ाई और नौकरी से खेती की ओर सफ़र

सुधांशु कुमार का जन्म बिहार के एक जमींदार परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्होंने अच्छे स्कूलों में पढ़ाई की और पढ़ाई में हमेशा आगे रहे। आगे चलकर उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के मशहूर हंसराज कॉलेज से इतिहास विषय में स्नातकोत्तर (Post Graduation) की डिग्री हासिल की। उनके पिता चाहते थे कि सुधांशु सिविल सेवा में जाएं और एक बड़ा अफ़सर बनें। पिता की इसी इच्छा को पूरा करने के लिए उन्होंने कई बार UPSC की परीक्षा दी। उन्होंने खूब मेहनत की, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया और सफलता नहीं मिली।

इसी बीच उन्हें टाटा कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर की नौकरी मिल गई। यह एक अच्छी नौकरी थी, लेकिन उनका मन वहाँ नहीं लगा। उनका दिल हमेशा गांव और खेती-बाड़ी से जुड़ा रहा। उन्होंने महसूस किया कि असली सुकून और पहचान तो अपनी मिट्टी में ही है। आखिरकार, उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया और 15 एकड़ ज़मीन पर खेती शुरू करने का निश्चय किया। यहीं से शुरू हुआ उनका असली सफ़र – खेतों की ओर, सपनों की ओर।

फलों की खेती से नई पहचान

सुधांशु कुमार ने खेती की शुरुआत छोटे पैमाने पर की थी, लेकिन उनके हौसले और मेहनत में कोई कमी नहीं थी। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी ज़मीन का विस्तार किया और अपनी मेहनत को कई गुना बढ़ाया। आज वे कुल 150 एकड़ ज़मीन पर खेती कर रहे हैं, जिसमें से 125 एकड़ सिर्फ़ फलों की खेती (Fruit Farming) के लिए समर्पित है। उनके बागों में आम, लीची, मौसमी, केला, अमरूद और नींबू जैसे पारंपरिक भारतीय फल पाए जाते हैं। ये फल न सिर्फ़ स्वाद में बेहतरीन हैं, बल्कि बाज़ार में इनकी अच्छी मांग भी रहती है।

पारंपरिक फलों के साथ-साथ सुधांशु ने स्ट्रॉबेरी और ड्रैगन फ्रूट जैसी आधुनिक और विदेशी फ़सलों की भी खेती शुरू की है। इन फलों की मांग न सिर्फ़ भारत में, बल्कि विदेशों में भी लगातार बढ़ रही है। इन खास फ़सलों ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई है और उनकी कमाई में भी जबरदस्त इजाफा किया है। सुधांशु की सोच और मेहनत ने यह साबित कर दिया कि अगर किसान समय के साथ बदलाव अपनाएं, तो खेती भी एक मुनाफ़े वाला और सम्मानजनक पेशा बन सकता है।

ड्रैगन फ्रूट की खेती में सफलता

ड्रैगन फ्रूट को जोखिम भरी फ़सल माना जाता है, लेकिन सुधांशु ने इसे भी सफल बना दिया। उनका मानना है कि किसान अगर नई तकनीक और सोच अपनाएं तो हर फ़सल से लाभ संभव है। फलों की खेती (Fruit Farming) में उनका प्रयोग बताता है कि जोखिम उठाने से ही बड़ा फ़ायदा मिलता है।

रोज़गार और किसानों को प्रेरणा

सुधांशु कुमार न सिर्फ़ खुद खेती कर रहे हैं बल्कि 20 लोगों को स्थायी रोज़गार भी उपलब्ध करा रहे हैं। हर साल वे लगभग 20 लाख रुपये मजदूरी और वेतन में ख़र्च करते हैं। इसके अलावा, वे आसपास के किसानों को भी फलों की खेती (Fruit Farming) के नए-नए तरीकों की ट्रेनिंग देकर प्रेरित करते हैं।

केले की खेती से अतिरिक्त लाभ

वे 25 एकड़ में जी-9 किस्म के केले की खेती कर रहे हैं। यह किस्म अपनी अधिक पैदावार और रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए जानी जाती है। मौसम खराब होने पर भी यह फ़सल अच्छा उत्पादन देती है, जिससे उनकी आय और अधिक स्थिर हो जाती है।

UPSC की तैयारी छोड़ फलों की खेती से सुधांशु कुमार ने की करोड़ों में कमाई

परंपरा और आधुनिकता का संगम

सुधांशु की खेती इस बात का उदाहरण है कि अगर परंपरा और आधुनिकता को मिलाकर काम किया जाए तो खेती में अपार संभावनाएं हैं। पारंपरिक फलों के साथ-साथ आधुनिक और महंगे फलों की खेती (Fruit Farming) करके उन्होंने अपनी आय को कई गुना बढ़ा लिया।

किसानों के लिए प्रेरणा

आज सुधांशु कुमार न सिर्फ़ एक सफल किसान हैं, बल्कि किसान-उद्यमी और प्रेरणा का प्रतीक भी हैं। उनकी सोच ने यह साबित किया है कि फलों की खेती (Fruit Farming) केवल आमदनी का ज़रिया नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और सामाजिक बदलाव का माध्यम भी है।

निष्कर्ष

सुधांशु कुमार की कहानी ये दिखाती है कि असफलताओं के बाद भी रास्ते निकलते हैं। अगर सोच आगे की हो, तो खेती अफ़सर की नौकरी से कम नहीं है। उनकी मेहनत और विजन ने यह सिद्ध किया है कि फलों की खेती (Fruit Farming) अपनाने से न सिर्फ़ व्यक्तिगत सफलता मिलती है, बल्कि समाज और किसानों को भी नई दिशा मिलती है।

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